सुप्रीम कोर्ट में SC/ST 'क्रीमी लेयर' पर केंद्र सरकार का बड़ा एक्शन, हलफनामा दायर कर किया कड़ा विरोध

 केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया है कि SC/ST का पिछड़ापन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और संरचनात्मक है। आरक्षण से क्रीमी लेयर को बाहर करने का अधिकार केवल संसद के पास है।

नई दिल्ली/औरैया (मातवी न्यूज़ ब्यूरो):

अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण में 'क्रीमी लेयर' लागू करने की बहस के बीच केंद्र सरकार ने अपना रुख पूरी तरह से साफ कर दिया है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में एक विस्तृत 'काउंटर एफिडेविट' (लिखित जवाब) दाखिल करते हुए SC/ST आरक्षण में आय के आधार पर क्रीमी लेयर (मलाईदार तबके) को बाहर करने की मांग का कड़ा विरोध किया है।

​सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका (रमाशंकर प्रजापति बनाम भारत संघ) के जवाब में सरकार ने ऐतिहासिक और संवैधानिक तर्कों के साथ अपनी बात रखी है।

​गरीबी नहीं, सदियों का उत्पीड़न है आधार

​सरकार ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया है कि SC/ST समुदायों का पिछड़ापन केवल 'आर्थिक कमी' या गरीबी नहीं है। इसका मूल कारण सदियों से चला आ रहा ऐतिहासिक उत्पीड़न, अस्पृश्यता (अनुच्छेद 17) और सामाजिक बहिष्कार है। सरकार का तर्क है कि इस पिछड़ेपन को सामान्य आर्थिक तंगी के रूप में नहीं देखा जा सकता।

​"पैसे आने से नहीं मिटता जातिगत कलंक"

​क्रीमी लेयर का विरोध करते हुए केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में एक बहुत ही महत्वपूर्ण तर्क दिया है। हलफनामे के अनुसार, आर्थिक उन्नति (वर्गीय उत्थान) से जाति-आधारित पूर्वाग्रह स्वतः समाप्त नहीं होते। सरकार का मानना है कि यदि कोई SC/ST व्यक्ति अच्छी नौकरी पाकर आर्थिक समानता प्राप्त कर भी लेता है, तो भी शिक्षा जगत या कॉर्पोरेट जैसे प्रतिष्ठित क्षेत्रों में उसे गहरे सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए केवल 'आय' (Income) के आधार पर उन्हें आरक्षण से बाहर करना मूलभूत रूप से गलत है।

​OBC और SC/ST आरक्षण में है बड़ा अंतर

​सरकार ने स्पष्ट किया कि ओबीसी (OBC) और एससी/एसटी (SC/ST) के आरक्षण के आधार अलग-अलग हैं। ओबीसी की पहचान 'सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन' के आधार पर होती है, जहां आर्थिक मानदंड (क्रीमी लेयर) लागू किया जा सकता है। लेकिन SC/ST पर क्रीमी लेयर की अवधारणा लागू नहीं होती, क्योंकि उनकी स्थिति सदियों के छुआछूत और भौगोलिक अलगाव से उत्पन्न हुई है।

​संसद का अधिकार, न्यायपालिका का नहीं

​अपने जवाब में केंद्र ने 'शक्तियों के पृथक्करण' (Separation of Powers) का हवाला देते हुए कहा कि SC/ST की राष्ट्रपति सूची में किसी भी समुदाय को शामिल करने या बाहर करने (क्रीमी लेयर लागू करने) का अधिकार केवल संसद के पास है। सरकार का कहना है कि न्यायिक रूप से क्रीमी लेयर लागू करना संवैधानिक सूचियों में छेड़छाड़ करने जैसा होगा।

​ठोस अनुभवजन्य आँकड़ों (Empirical Data) की आवश्यकता

​हलफनामे में इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है कि राष्ट्रव्यापी सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना के सूक्ष्म आँकड़ों के बिना क्रीमी लेयर जैसी आय वरीयता प्रणाली लागू करना त्रुटिपूर्ण और वैज्ञानिक रूप से मनमाना होगा।

​क्यों उठा था यह विवाद?

​गौरतलब है कि 1 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की संविधान पीठ ने 'पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह' मामले में SC/ST आरक्षण के भीतर अति-पिछड़ों के लिए 'उप-वर्गीकरण' (Sub-classification) को मंजूरी दी थी। इसी फैसले के दौरान कुछ जजों ने टिप्पणी की थी कि SC/ST में भी क्रीमी लेयर लागू होना चाहिए, ताकि आरक्षण का लाभ कतार में खड़े सबसे गरीब व्यक्ति तक पहुँच सके। इसी टिप्पणी के बाद से देशभर में राजनीतिक सरगर्मी और विरोध प्रदर्शन तेज हो गए थे, जिसके बाद अब केंद्र ने अदालत में अपना यह लिखित जवाब दाखिल किया है।

​उत्तर प्रदेश - मातवी न्यूज़)


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